Hadees e Mubaraka

*بسم الله الرحمن الرحيم*
*الصــلوة والسلام‎ عليك‎ ‎يارسول‎ اللهﷺ*

Hazrat Anas Bin Maalik رضي الله عنه se riwayat hai Jab Huzoor Nabi e Kareem ﷺ Hazrat Abu Bakr Siddiq رضي الله عنه Hazrat Umar e Farooq رضي الله عنه aur Hazrat Usman Gani رضي الله عنه ke humraah uhad pahaad par tashreef farma hue toh woh apne muqaddar par naaz karte hue fart o massarrat se jhoomne laga Huzoor Sayyed e Aalam ﷺ ne apne qadam mubarak maar kar uss pahad se farmaya "Aye uhad! Tham jaa tujhpar ek Nabi, ek Siddique, aur do shaheed hai.

*#Bukhari Shareef,Hadees No. 3686.*

📕 करीना -ए-जिन्दगी 📕

*_✭ﺑِﺴْــــــــــــــــﻢِﷲِﺍﻟﺮَّﺣْﻤَﻦِﺍلرَّﺣِﻴﻢ✭_*

*_★الصــلوة والسلام عليك يارسول الله ﷺ★_*
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          _*📕 करीना -ए-जिन्दगी 📕*_

                ✍🏻 _*.....भाग-1⃣3⃣*_

                *_[जरा इसे भी पढ़िए!]_*
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*♻ [ निकाह से पहले लड़की देखना ] ♻*
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   _💎  हुज़ूरे अकरम ﷺ की ख़िदमते अक्दस में एक मर्तबा एक सहाबिया खातुन  हाजीर हुई और आपसे निकाह की दरख़्वास्त की, लेकिन हुज़ूर ﷺ ने अपना सर मुबारक झुका लिया और उन्हें कुछ जवाब न दिया । एक सहाबी ने खड़े होकर अ़र्ज़ किया "या रसूलुल्लाह अगर आपको उस औरत की जरूरत नही है,  तो उसका निकाह मेरे साथ फरमा  दीजिए" । हुजुर ﷺ के उन से पूछने पर मअ़लूम हुआ कि उनके पास मुफलिसी की वजह से कुछ रुपये, पैसे,  कपड़ा वगैरह नहीं है।  यहां तक की यहां महर  अदा करने के लिए एक अंगूठी  तक भी नहीं है! अलबत्ता क़ुरआन की कुछ सूरतें याद है! चुनांचे हुजुर ﷺ ने उनके क़ुरआन करीम जानने के सबब से उस सहाबीया खातुन  का निकाह उस सहाबी से फरमा दिया!_
*📚 [बुखारी शरीफ जिल्द 3, बाब नं 65, हदिस नंबर    113 ]*

       _तंबी :-  उलमा ए इक्राम फरमाते है की यह खुसुसीयत उन्ही सहाबी के लिये मख्सुस थी और रसुलुल्लाह ﷺ के बाद ऐसा करने का किसी को हक नही है! क्यो की अल्लाह के रसुल का हुक्म खुद शरीयत है! आज इस तरह से निकाह करना जाइज नही!_
*📚 [अबु दाऊद शरीफ जिल्द 2, बाब नंबर 108 सफा नंबर 132]*
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           इसी तरह एक दूसरी हदीस में है कि रसूले अकरम ﷺ को ख्वाब में हज़रत आएशा सिद्दीका  रदिअल्लाहु तआला अन्हा को निकाह से पहले दिखाया गया।
*📚 [बुखारी शरीफ जिल्द 3, बाब नं 65, हदिस नंबर  112 ]*

     _इन हदीसे मुबारका  से  इमाम बुख़ारी रदि अल्लाहु तआला अन्हु ने यह साबित किया  है की औरत को निकाह से पहले  देखना जाइज़ है_
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_*📚 [ हदीस :- ]....* सैय्यदना इमाम मुहम्मद ग़ज़ाली [रदि अल्लाहु तआला अन्हु] फरमाते है_
     
             _"निकाह से पहले औरत को देख लेना इमाम शाफ़अ़ई [रदिअल्लाहु तआला अन्हु] के नज़दीक सुन्नत है।_
_* 📚  [ हदीस :-*  यही इमाम ग़ज़ाली आगे नक़्ल फरमाते है। के_

    _औरत का ज़माल  मुहब्बत व उल्फ़त का ज़रीया है इसलिए निकाह करने से पहले लड़की को देख लेना सुन्नत है। बुजुर्गों का कौ़ल है कि औरत को बे देखे जो निकाह होता है उसका अंजाम परेशानी और ग़म है।_

*📕 [ कीमीया-ए-सआ़दत, सफा नं 260, ]*
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_*📚 [ हदीस :- ]* हुज़ूर सैय्यदना गौ़से आ़ज़म शेख अब्दुल क़ादिर ज़ीलानी [रदिअल्लाहु तआला अन्हु] इरशाद फरमाते है।--_

    _मुनासिब है के निकाह से पहले औरत का चेहरा और ज़ाहिरी बदन  *[यानी हाथ मुँह वगैरह]* देख ले ताकि बाद मे नफरत या तलाक़ की नौबत न आए क्यों कि तलाक़ और नफरत अल्लाह तआला को सख्त  ना पसंद हैं।_
📕 *[ गुनयातुत्तालेबीन सफा नं 112, ]*
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*हदीसे पाक में है कि इल्म फैलाने वाले के बराबर कोई आदमी सदक़ा नहीं कर सकता।*
*(क़ुर्बे मुस्तफा,सफह 100)*

इस्लामी हैरत अंगेज़ मालूमात पोस्ट

*_﷽-الصــلوة والسلام‎ عليك‎ ‎يارسول‎ الله ﷺ_*
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    *《हजरत सुलैमान अलैहिस्सलाम》*
            *《का बयान पोस्ट(1)》*
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सवाल- हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम का जमाना हुजूर नबी करीम सल्लल्लाहु त‌आला अलैहि वसल्लम से कितने साल पहले है?
*जवाब- आप का जमाना हुजूर नबी करीम सल्लल्लाहु त‌आला अलैहि वसल्लम की विलायत से सत्रा सौ साल पहले है।*
📚(हाशिया जलालैन 8/275)

सवाल- हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम के वालिद और वालिदा का नाम करता है?
*जवाब- आपके वालिद हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम हैं और वालिदा मौहतरमा का नाम औरय्या है।*
📚(अल विदाया 2/15)

सवाल- हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम का सिलसिला नसब किन वास्तों से इब्राहिम अलैहिस्सलाम तक पहुंचता है?
*जवाब- हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम तक आपका सिलसिला नसब यूं है सुलैमान बिन दाऊद बिन ईशान बिन औवद बिन वाइर बिन सलमून बिन बख़शून बिन अमी बिन यारव बिन ख़ज़रून बिन फ़ारस बिन यहूदा बिन याकूब बिन इस्हाक बिन इब्राहिम अलैहिमुस्सलाम।*
📚(अल अतक़ान फी उलूमुल क़ुर‌आन 2/178)

सवाल- हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम की कितनी बीवियां थीं?
*जवाब- आपकी एक हजार बीवियां थीं जिनमें तीन सौ कुंवारियां और सात सौ बांदियां थीं।*
📚(अल कामिल फ़ी तारीख़ 1/89)
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*हदीसे पाक में है कि इल्म फैलाने वाले के बराबर कोई आदमी सदक़ा नहीं कर सकता।*
*(क़ुर्बे मुस्तफा,सफ़्हा100)*
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सुरए आले इमरान

*सुरए आले इमरान, रुकुअ-5, आयत, ⑤③*
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْـمٰـنِ الرَّحِـيْـمِ
اَلصَّــلٰـوةُ وَالسَّــلَامُ  عَــلَـيْـكَ يَا رَسُــوْلَ اللّٰه ﷺ
ऐ रब हमारे हम उस पर ईमान लाए जो तूने उतारा और रसूल के ताबे (अधीन) हुए तू हमें हक़ पर गवाही देने वालों में लिख ले.

*सुरए आले इमरान, रुकुअ-5, आयत, ⑤④*
और काफ़िरों ने मक्र (कपट) किया (23) और अल्लाह ने उनके हलाक की छुपवां तदबीर (युक्ति) फ़रमाई और अल्लाह सबसे बेहतर छुपी तदबीर वाला है (24)

*तफ़सीर*
(23) यानी बनी इस्त्राईल के काफ़िरों ने हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के साथ कपट किया कि धोखे के साथ आपके क़त्ल का इन्तिज़ाम किया और अपने एक आदमी को इस काम पर लगा दिया.
(24) अल्लाह तआला ने उनके कपट का यह बदला दिया कि हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम को आसमान पर उठा लिया और उस आदमी को हज़रत की शक्ल दे दी जो उनके क़त्ल के लिये तैयार हुआ था. चुनांचे यहूदियों ने उसको इसी शुबह पर क़त्ल कर दिया. “मक्र” शब्द अरब में “सत्र” यानी छुपाने के मानी में है, इसीलिये छुपवाँ तदबीर को भी “मक्र” कहते हैं. और वह तदबीर अगर अच्छे मक़सद के लिये हो तो अच्छी और किसी बुरे काम के लिये हो तो नापसन्दीदा होती है. मगर उर्दू ज़बान में यह शब्द धोखे के मानी में इस्तेमाल होता है. इसलिये अल्लाह के बारे में हरगिज़ न कहा जाएगा और अब चूंकि अरबी में भी यह शब्द बुरे मतलब में इस्तेमाल होने लगा है इसलिये अरबी में भी अल्लाह की शान में इसका इस्तेमाल जायज़ नहीं. आयत में जहाँ कहीं आया वह छुपवाँ तदबीर के मानी में है.
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मिट जाऐ गुनाहो का तसव्वुर ही दुन्या से,
गर होजाए यक़ीन के.....
*अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह देख रहा है...*
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*​DEEN-E-NABI ﷺ*

👉🏻 ईमान और कुफ़्र 👈🏻

🕋✭ ﺑِﺴْــــــــــــــــﻢِﷲِﺍﻟﺮَّحْمٰنِﺍلرَّﺣِﻴﻢ ✭🕌

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*{👉🏻 ईमान और कुफ़्र 👈🏻}*

*_हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम फरमाते हैं कि ईमान ये है कि तू इस बात की गवाही दे कि अल्लाह के सिवा कोई माअबूद नहीं और मुहम्मद सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम अल्लाह के रसूल हैं और ईमान ये है कि तू खुदाए तआला और उसके रसूलों उसके फ़रिश्तों उसकी किताबों और क़यामत के दिन और तक़दीर पर यक़ीन रखे_*

*📚 मुस्लिम,जिल्द 1,सफह 438*

*_यानि जो बात हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम से क़तई व यक़ीनी तौर पर साबित हो उसकी तस्दीक़ करना ईमान है और उनसे इनकार करना कुफ़्र है_*

*📚 अशअतुल लमआत,जिल्द 1,सफह 38*
*📚 शरह फ़िक़्हे अकबर,सफह 86*
*📚 तफ़सीरे बैदावी,सफह 23*

*_अहले सुन्नत वल जमाअत के सही व मुस्तनद अक़ायद जानने के लिए हुज़ूर सदरुश्शरीया मौलाना अमजद अली आज़मी अलैहिर्रहमा की किताब बहारे शरीयत हिस्सा अव्वल का मुताला ज़रूर करें जो कि हिंदी उर्दू इंग्लिश हर ज़बान में मौजूद है,अक़ायद का पूरा मसायल एक लंबा और तवील मज़मून है जिसका यहां दर्ज कर पाना बहुत ही मुश्किल है मैं यहां कुछ मुख़्तसर ज़िक्र करता हूं_*

*_अल्लाह एक है उसका कोई शरीक नहीं ना ज़ात में ना सिफात में ना अफ़आल में ना अहकाम में और ना अस्मा में,ना उसका कोई बाप है और ना बेटा,वो अज़्ली व अब्दी है यानि जब कुछ ना था तो वो था और जब कुछ ना रहेगा तब भी वो होगा एक उसके सिवा सब कुछ हादिस है यानि फ़ना है_*

*_! वो सबसे बे परवाह है यानि किसी का मोहताज नहीं सारा जहान उसका मोहताज है_*

*_! वो हर ऐब से पाक है मसलन झूट,दग़ा,खयानत,ज़ुल्म,जहल,बेहयाई_*

*_! वो जिस्म जिस्मानियत से पाक है मसलन हयात,क़ुदरत,सुनना,देखना,कलाम,इल्म,इरादा सब उसकी सिफ़ात है मगर इसके लिए उसे ना तो जिस्म की ज़रूरत है ना रूह की ना कान की और ना आंख की_*

*_! वो ज़माना और मकान से पाक है,लिहाज़ा उल्मा इसी लिए ऊपर वाला कहने से मना फरमाते हैं_*

*_! हर भलाई और बुराई का पैदा करने वाला वही है मगर किसी गुनाह की निस्बत उसकी तरफ करना सख़्त हिमाक़त है बल्कि अपने नफ़्स की शरारत कहें_*

*_! उसके हर काम में कसीर हिकमतें होती हैं भले ही वो हमें अच्छी लगे या बुरी,लिहाज़ा क़ुदरत के किसी भी फेअल को हमेशा अपने लिए भला ही जानें_*

*_किसी भी अम्बिया की शान में अदना सी गुस्ताखी या बे अदबी करना कुफ़्र है_*

*_! तमाम अंबिया मासूम हैं यानि उनसे गुनाह का होना मुहाल यानि नामुमकिन है,और उनसे जो भी लग्ज़िशें हुई उनका ज़िक्र सिवाये क़ुरान की तिलावत या हदीस की रिवायत के अलावा हराम हराम और सख्त हराम है_*

*_! नुबूव्वत विलायत की तरह कसबी नहीं कि कोई भी अमल के ज़रिये नुबूव्वत हासिल कर ले,लिहाज़ा जो ऐसा जाने काफिर है_*

*_! कोई वली कितने ही बड़े मर्तबे का हो हरगिज़ किसी भी नबी की बराबरी नहीं कर सकता सो जो अपने आपको किसी नबी से बराबरी का दावा करे काफिर है_*

*_! अम्बिया की तादाद मुतअय्यन करना जायज नहीं कि इस मसले पर इख़्तिलाफ़ बहुत हैं लिहाज़ा जो भी तादाद बतायी जाए मसलन 124000 या 224000 तो वो कमो-बेश के साथ कही जाए_*

*_! हुज़ूर खातेमुन नबीयीन हैं जो उनके बाद किसी को नुबूव्वत का मिलना जाने काफिर है_*

*_! हुज़ूर को जिस्म ज़ाहिरी के साथ मेराज हुई,जो मस्जिदे हराम से मस्जिदे अक्सा तक के सफर का इन्कार करे काफिर है और आगे का मुनकिर गुमराह_*

*_! हुज़ूर को हर किस्म की शफाअत हासिल है जो इन्कार करे गुमराह है_*

*_! हुज़ूर मालिको मुख्तार हैं जो इन्कार करे काफिरो गुमराह है_*

*_फ़रिश्ते भी मासूम होते हैं इनके अलावा तमाम औलिया व अब्दाल गुनाह से महफूज़ होते हैं मासूम नहीं_*

*_! किसी भी फ़रिश्ते की तनकीस कुफ्र है मसलन अपने किसी दुश्मन को देखकर ये कहना कि मलकुल मौत आ गया करीब कल्मये कुफ्र है_*

*_तमाम आसमानी किताबों पर ईमान लाना ज़रूरी है,मगर हुक्म अब सिर्फ क़ुरान का ही चलेगा_*

*_! जो कुरान को ना मुक़म्मल जाने काफिर है_*

*_! क़ुरान की आयतों से मज़ाक करना भी कुफ्र है मसलन दाढ़ी मुंडा कल्ला सौफा पेश करे या भूखा कहे कि मेरा पेट क़ुल हुवल्लाह पढ़ता है_*


*_ये अक़ीदा रखना कि मरने के बाद रूह किसी और जिस्म में या जानवर में चली गयी है कुफ्र है_*


*_! हश्र रूह और जिस्म दोनों का होगा जो ये कहे कि अज़ाब या हिसाब सिर्फ रूह का होगा जिस्म का नहीं काफिर है_*

*_अज़ाबे क़ब्र,हश्र,जन्नत,दोज़ख सब हक़ हैं_*



*_यूंही आमाले दीन मसलन किसी से नमाज़ पढ़ने को कहा और उसने जवाब दिया कि बहुत पढ़ ली कुछ नहीं होता काफिर हो गया_*



*_! रमज़ान के रोज़े रखने को कहा और जवाब दिया कि रोज़ा वो रखे जिसके घर खाने को ना हो काफिर हो गया_*



*_! यूंही एक हल्की सुन्नत मसलन नाख़ून काटने को कहा तो जवाब दिया कि नहीं काटता अगर चे सुन्नत ही क्यों ना हो काफिर हो गया_*



*_! यूंही किसी आलिम की तौहीन इसलिये की ये आलिमे दीन है कुफ्र है_*





*_! यूंही किसी काफिर के त्यौहार मसलन होली,दीवाली,राम-लीला,जन-माष्ट्मी के मेलों में शामिल होकर शानो शौकत बढ़ाना भी कुफ्र है_*




*_! यूंही किसी बदमज़हब फिरके को पसंद करना या मज़ाक में ही अपने आपको उन बातिल फिरकों का बताना कुफ़्र है_*

*_! युंहि किसी मुसलमान को काफ़िर कहना कुफ़्र है उसी तरह किसी कफ़िर को मुसलमान कहना भी कुफ़्र ही है,याद रखें कि वहाबी देवबन्दी क़ादियानी खारजी राफजी अहले हदीस जमाते इसलामी और जितने भी 72 बद-मज़हब फ़िरके हैं सब काफ़िरो मुर्तद हैं_*

*📚 बहारे शरीयत,हिस्सा 1,सफह 1----79*
*📚 अनवारुल हदीस,सफह 90-91*
*📚 अहकामे शरीयत,हिस्सा 2,सफह 163*

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*हजरते अमीर खुसरो का खूबसूरत वाकिया*

*हजरते अमीर खुसरो का खूबसूरत वाकिया*

  *हजरते अमीर खुसरो*  *हजरते महबूबे  इलाही ख्वाजा निजामुद्दीन औलिया रहमतुल्लाह अल्यह* के मुरीद थे एक बार  *हजरते महबूबे इलाही* ने फरमाया ए *खुसरो* हर जुमेरात के दिन *हजरते बूअली शाह कलंदर* के यहां महफिल होती है आप इस महफिल में शिरकत किया कीजिए *पीरो मुर्शिद* का हुक्म था *हजरते अमीर खुसरो* ने जाना शुरू कर दिया एक जुमेरात की महफिल में *हजरते बूअली शाह कलंदर* ने फरमाया *खुसरो* हमने कभी भी *अल्लाह* के *नबी* की कचहरी में (दरबार) में तुम्हारे *पीर महबूबे इलाही* को नहीं देखा यह बात सुनकर *हजरत अमीर खुसरो* बहुत परेशान हो गए आपको अपने *पीर* से बेहद मोहब्बत थी और जैसा कि हर *मुरीद* को अपने *पीर* से बेहद मोहब्बत होती है *अमीर खुसरो* को भी थी?आप काफी परेशान रहने लगे

एक दिन *हजरते महबूबे इलाही* ने फरमाया *खुसरो* परेशान दिखते हो क्या बात है *अमीर खुसरो* ने फरमाया  *सय्यदी*  एसिकोई  बात नहीं मगर *पीर* ने *मुरीद* के बेचैन दिल का हाल जान लिया था पूछने लगे बताओ क्या बात है किस बात से परेशान हो *हजरत अमीर खुसरो* ने पूरा माजरा बता दिया इस पर *हजरते महबूबे  इलाही* ने फरमाया कि अगली बार जब *हजरते बूअली शाह कलंदर* ऐसा कुछ फरमाए तो उनसे अर्ज करना कि आप मुझे *अल्लाह* के *नबी सल्लल्लाहु तआला अलयही वसल्लम* की कचहरी(दरबार) में पहुंचा दे मैं अपने *शेख* को मैं खुद ही तलाश कर लूंगा *हजरत अमीर खुसरो* बहुत खुश हो गए कुछ दिन बाद फिर *हजरते बूअली शाह कलंदर* ने ऐसा ही फरमाया तो आपने कहा *हजरत* आप मुझे *अल्लाह* के *नबी* की कचहरी(दरबार) में पहुंचा दें में अपने *शेख* को मैं खुद ही तलाश कर लूंगा तो *हजरत बूअली शाह कलंदर* मुस्कुराए और आपके सीने पर हाथ रखा तो जब आंखें बंद की तो दिल की आंख खुल गई और *हजरत अमीर खुसरो* *बारगाहे  महबूबीयत* यानी *बारगाहे रिसालत* में पहुंच गए और पहुंचकर *हरवली अल्लाह* का चेहरा देखने लगे मगर *हजरते महबूबे इलाही* नजर ना आए इतने में *अल्लाह* के *रसूल* ने फरमाया ए *खुसरो* किसको तलाश करते हो *अमीर खुसरो* ने फ़रमाया *हुजूर* अपने *शेख* को तलाश करता हूं कुर्बान जाए मेरे *आका* ने फरमाया इससे ऊपर वाली कचहरी  (दरबार) में जाओ तो आप उससे ऊपर वाली कचहरी (दरबार)में चले गए वहां भी मेरे *आका*  मौजूद थे *हजरत अमीर खुसरो* फिर हर *वली अल्लाह*  चेहरा देखने लगे मगर आपको आपके *शेख* नजर ना आए *अल्लाह* के *हबीब* ने यहां भी *अमीर खुसरो* से मुखातिब हुए फरमाया *खुसरो* किसे तलाश करते हो अर्ज की *हुजूर* अपने *शेख* को तलाश करता हूं फरमाया इससे ऊपर वाली कचहरी मनजील में जाओ इस तरह करते करते *अमीर खुसरो* सातवीं कचेरी (मनजील)जो के आखिरी कचहरी (मनजील) तक पहुंच गए और *हरवली* का चेहरा देखने लगे हर मंजिल के साथ साथ इन्हें अपने *पीर* को देखने की  तड़प बढ़ती जा रही थी वहां भी *अल्लाह* के *नबी सल्लल्लाहु तआला अलयही वसल्लम*
मौजूद थे और आप के बिल्कुल करीब एक *बुजुर्ग* थे और इनके बिल्कुल पीछे एक और *बुजुर्ग*
*नबी सल्लल्लाहु तआला अलयही वसल्लमने* इनसे फरमाया कि कभी पीछे भी देख लिया कीजिए तो जैसे ही उन्होंने पीछे देखा तो वह *हजरते महबूबे इलाही* थे और इनके बिल्कुल आगे जो *बुजुर्ग* थे *वलियों के सरदार* *हजरत गौसे* आजम *पीराने पीर* थे *हजरत अमीर खुसरो* ने इतने दिनों की परेशानी के बाद अपने *शेख* का यह मकाम देखा तो *वलियों* के दरमियान में से अपने *शेख* तक पहुंचने की कोशिश की यहां साथ ही *हजरते बूअली शाह कलंदर* ने अपना हाथ उठा लिया और आप साथ ही फिर इसी दुनिया ए फानी में आ गए लेकिन आप वजद में थे झूम ते झूमते अपने *शेख* के आस्ताने तक आए और यह कलाम लिखा
*नमी दानम के आखिर चूं मनम दीदार*

ये सारे वाक्य में कुछ बातें बहुत अहम है एक यह है कि जिस तरह *अल्लाह के हबीब सल्लल्लाहु तआला अलयही वसल्लम* हर कचहरी (मनजील) में मौजूद है इसी तरह आप हर जगह मौजूद है और अपने हर उम्मती का अहवाल और नाम तक जानते हैं जभी तो *अमीर खुसरो* का नाम लेकर मुखातिब हुए दूसरी यह कि *हजरते बूअली शाह कलंदर* *अमीर खुसरो* को उनके *शेख* उनके *पीर* का मकाम दिखाना चाहते थे
यह सब वाक्य में हजरत *अमीर खुसरो* की सबसे बड़ी खुश कीसमती यह है के *हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलयही वसल्लम* सात मर्तबा मुखातिब हुए ओर सात मर्लबा  *अल्लाह* के रसूल का *दीदार* हुआ  *अल्लाहु अकबर*

इससे बढ़कर एक उम्मती के लिए खुशकिस्मती क्या हो सकती है मालिक हमें भी अपने #नबी सल्लल्लाहु तआला अलयही वसल्लम* बारगाह में कुबुल फरमाए आमीन
*मोहे अपने ही रंग में रंग दो निजाम.

GAZWA E OHUD MUBARAK

Aapko aur Aalam e Islam ko Fateh Jang e Ohad aur Urse SHOHDA E OHUD Bohat Bohat Mubarak Ho!💐

Aaj 15 Shawwalul Mukarram
*Shahaadat e Ameer e HAMZA RadiyAllahuAnhu Aur Fateh Jang e Ohad Hai*

Hazrat Ameer e Hamza RadiyAllahuAnhu k Janaaze ko Farishton ne Gusl Diya aur
Iski Tasdeeq khud Sarware Aalam SallAllahuAlaihiWasallam ne Farmaai

Hazrat Ameer e Hamza ka Janaaze ki Namaz Sarkar SallAllahuAlaihiWasallam ne 70 Martaba Ada Farmaai

Hazrat e Jibraeel AlaihisSalaam Sarkar ki Bargah me Haazir huwe aur Arz Kiya k
Hazrat Ameer e Hamza ka Naam 7Saaton Aasmaanon me Allah aur Allah k Rasool ka Sher likha Gaya hai
SubhanAllah

Behaqi Sharif se Riwayat Hai k Hazrate Fatimah Zehra SalaamullahiAlaiha Farmaati Hai k Main ne Mazaar e Saiyyaduna Ameer e Hamza Par Salaam Arz Kiya to Qabr k Andar se Mere Salam ka Jawab Diya Gaya Jise main ne Apne Kaano se Suna SubhanAllah

Huzoor Sarwar e Aalam SallAllahuAlaihiWasallam Aksar Apne Sahaba k Saath Hazrat Ameer e Hamza k Mazar e Paak Par Tashreef le Jaate aur Wahan Salaam Farmaate the
SubhanAllah
(Hujjatul Aalameen JILD 2 Safa 864)

Tamam Shohda e Ohad RadiyAllahuAnhum ki Bargah e Paak me Khub Isaal e Sawaab Pohcha Kar Apni Duniya o Aakhirat Sawaarein

Allah Paak Hazrat e Ameer e Hamza aur Shohda e Ohad RadiyAllahuAnhum k Sadqe Tufail Aalam e Islam pe Apna Fazl e Khaas Farmaaye.
Aameen Bijaahin Nabiyyil Kareem SallAllahuAlaihiWasallam

*JAAN NISAARAANE BADR O UHUD PAR DUROOD*
*HAQ GUZAARAANE BAI'AT PE LAAKHON SALAAM*

*UNKE AAGE WOH HAMZA رضي الله عنه  KI JAAÑ BAAZIYAAN,*
*SHER e GURRAANE SATWAT PE LAAKHON SALAAM.*

GAZWA E OHUD:
15 Shawwal 3 hijri,
Muslims-700
Kaafirs-3000.

Ta'weez Pahenne Ka Saboot Sahaabi Aur Mohaddiseen Se..

1 - Jaam'e Tirmizi, Hadees No.3528 Tarjumah - "Rasoolullah ﷺ Ne Farmaaya Ke Jab Tum Me Se Koi Nee'nd Me Darr Jaaye To Yeh Du...